My Shayari
Shayari 0:
" सही और गलत का फैसला आखिर कौन करता है?
मेरी शर्ट का कलर किसी के लिए सही होगा तो मेरा पहनावा किसी के लिए गलत।
किसी के लिए मेरी स्किन सावली होगी तो किसी के लिए मेरा मुह काला।
ये सही और गलत के बीच में क्या है जो ना ही सही है और ना ही गलत।
और सही नहीं है तो क्यों नहीं है और गलत है तो सही क्या है,
यह सही और गलत का फैसला आखिर कौन करता है।
किसी को खयालो में बसाना सही है क्या, अगर बाहों में कोई और हो।
और जो बाहों में है वो सही नहीं, तो जो खयालो में है वो गलत कैसे।
यह सही और गलत का फैसला आखिर कौन करता है?
अगर चोरी करने की सज़ा मिलती है तो दिल दुखाने की सज़ा भी तो मिलनी चाहिए।
अगर अदालतों में घरों को तोड़ने की सुनवाई की जाती है तो घर तबाह करने की भी तो सज़ा मिलनी चाहिए।
अगर अपनी जेबो को पैसो से भरना गलत है तो किसी एक इंसान को देवता की तरह पूजना सही है क्या?
अगर किसी एक इंसान से दिल खोल कर प्यार करना सही है तो जब वो
किसी और से करता है तो मुझे सही क्यों लगता है।
और वो सही है तो मै गलत क्यों, यह सही और गलत के बीच में कुछ होता भी है क्या?
यह सही गलत और गलत सही इसका फैसला आखिर कौन कर सकता है। ".
Shayari 0:
" लोग बचते हैं समुंदर से लेकिन, हम तुम्हारी आँखों में डूबने को तैयार हैं।
किसको देखने की चाहत करें,तुमको देख लिया है एक बार।
तुम्हारी ज़ुल्फ़ों की गहराई है बहुत,और हमको पसंद नहीं आता है किनारा।
लोग कहते हैं चाँद का टुकड़ा हो तुम, हम कहते हैं चाँद टुकड़ा है तुम्हारा!".
Shayari 0:
" Tumhri zubaan se jaisa nikle sab vaisa ho जाता hai,
Tum bas aachha कहती ho aur sab aachha ho जाता hai.
Tumhra bas ये पूछना dukh ke mujhse 'tum कैसे ho',
Tumhre itna पूछने se hi dukh aadhha ho जाता hai.
Tumhre haath nahin hain maano paaras patthar hai koi,
Tum jiss jiss ko chhoo देती hai sab sona ho जाता hai."♥️♥️".
Shayari 1:
मुझे तसल्ली दे दे जो
वो शब्द उधारा ढूँढ रहा है,एक सितारा ढूँढ रहा है
दिल सैयारा ढूँढ रहा है
सैयारा मतलब__वो तारा जो एक जगह पे ना ठहरे
फिर भी अपनी चमक ना बदले,चाल ना बदले
और ना बदले वो चेहरे,अम्बर जैसा एक समुद्र
चाँद है,
कश्ती पानी में देखो जोर जवानी में
एक किनारा ढूँढ रहा है दिल सैयारा ढूँढ रहा है #सैयारा___❤✨
Shayari 2:
In English we Say "I love you",
But in Poetry We Say –
"तुझे मानूं खुदा मैं, तुझे जहाँ लिख दूँ।
तू जो देखे न कोई मंज़र, तो उस मंज़र को सदा के लिए मैं भी न देखूं।"
तेरी हर चाहत को बिना बोले समझ लूं,
तेरी आँखों को किसी किताब सा पढ़ लूं।
अपने साँसों पे जीने की वजह, नाम तेरा लिख दूँ।..."
"तू जो माने तो तुझे खुदा कह दूँ...खुद का पूरा जहाँ लिख दूँ।"
तेरे ग़मों को दिल-ओ-जान से अपना लूं,
और अपनी सारी ख़ुशियों के पलों को तेरे नाम लिख दूँ।
तू जो बोले तो, तुझे ख़ुदा लिख दूँ..."
तेरे नाम ये पूरा आसमां लिख दूँ।
खुद का बनाया हुआ जहाँ लिख दूँ,
तू जो बोले तो, तुझे ख़ुदा लिख दूँ..."
अगर फिर भी कोई ख्वाहिश हो,
तो इतना समझ ले—
हर कविता के अंत में
मैं ख़ुद को,
सिर्फ़ तेरा,और सिर्फ़ और सिर्फ़ तेरा लिख दूँ।
तू जो बोले तो, तुझे ख़ुदा लिख दूँ,मैं अपना पूरा जहाँ लिख दूँ....।
Shayari 3:
सोचो, अगर वह काजल लगा ले।
सोचो, अगर वह काजल लगा ले।
एक दफा बस उलझे बाल सुलझा ले,
ये ज़माना अपना रुख ना बदल दे
हर कोई उसके साथ ना चल दे
ये हवाएँ रुक ना जाए उसे देखने को कहीं
मैंने जब से देखा है मैं हूँ वहीं..........
Shayari 4:
क़़ासिम कभी गजनी से
भिड़ा ठाकुर!
हार तो तय थी..
पर लड़ा ठाकुर,
हारना ही था उसे,
वो अकेला लड़ा था,
व्या जन्मभूमि ये तुम्हारी नहीं थी?
फिर क्यों अकेला लड़ा ठाकुर?
बीवी बेवा हुई
बच्चे हुए अनाथ!!
हिन्दू तो बचा पर,
भरी जवानी में ही
मरा ठाकुर |
सदियों से रक्त दे
माटी को सींचा,
जन, जन्मभूमि
और धर्म की वेदी पर
मिटा ठाकुर!
मौत होती तो
लड़ भी लेता,
पर.अपनों की घृणा से
सहमा-डरा ठाकुर!
जिनके लिए सब कुछ खोया,
क्यों उनकी ही नजरों में बुरा ठाकुर ?
फ़िल्मों का ठाकुर!
कहानियों- क़िस्सों का ठाकुर!
कविताओं का ठाकुर
Shayari 5:
हादसा बन के कोई ख्वाब बिखर जाये तो क्या हो ,
वक़्त जस्बात को तब्दील नहीं कर सकता ,
दूर हो जाने से एहसास नहीं मर सकता ...
ये मोहब्बत है दिलों का रिश्ता ... ये मोहब्बत है दिलों का रिश्ता
ऐसा रिश्ता जो सरहदों में कभी तब्दील नहीं हो सकता ..
तू किसी और की रातों का हसीं चाँद सही ,
मेरे हर रंग में शामिल तू है ..
तुझसे रोशन हैं मेरे ख्वाब मेरी उम्मीदें ,
तू किसी भी राह से गुज़ारे ,
मेरी मंजिल तू है ...
Shayari 6:
पिछले बरस तुम साथ थे मेरे और दिसम्बर था
महके हुए दिन-रात थे मेरे और दिसम्बर था
चाँदनी-रात थी सर्द हवा से खिड़की बजती थी
उन हाथों में हाथ थे मेरे और दिसम्बर था
बारिश की बूंदों से दिल पे दस्तक होती थी
सब मौसम बरसात थे मेरे और दिसम्बर था
भीगी ज़ुल्फ़ें भीगा आँचल नींद थी आँखों में
कुछ ऐसे हालात थे मेरे और दिसम्बर था
धीरे धीरे भड़क रही थी आतिश-दान की आग
बहके हुए जज़्बात थे मेरे और दिसम्बर था
प्यार भरी नज़रों से 'फ़रह' जब उस ने देखा था
बस वो ही लम्हात थे मेरे और दिसम्बर था ...
Shayari 7:
मेरी लिखावट का मतलब क्या हो, जो तुम न उसको पढ़ पाओ? जो पढ़ लो तो भेद मिट जाए, मुझे पाने की चाहत पाओ।
मेरी कलम तुम्हारे नाम का ज़िक्र दिन भर करती पाती है, जो वो सोचे किसी और के बारे में, तुमसे इतनी
फुर्सत भी कहाँ मिल पाती है।
खुद भगवान बनके मेरी ज़िन्दगी में जो तुम आए हो, बस एहसास तुम्हारा साथ है, आँखों को कहाँ दिख पाये हो।
अब खैर कब तक अपने दर्शन को तुम मुझे ऐसे तरसाओगे? विलास की सतह पे बैठी मैं, मुझे आके गले नहीं लगाओगे?
यूँ जो तुम्हारा चयन करते-करते मेरी साँस है फूल गई, बता तो दे अब कि क्या है गलत? क्या है सही?
अपनी मेज़ पे रखी किताबों में कब तक मेरी कविताओं के पन्ने छुपाओगे? अपने नाम का ज़िक्र हर जगह पाकर कब
तक अकेले मुस्कुराओगे?
मेरी लेखनी की ताक़त क्या हो जो तुम न उसको पढ़ पाओ? और जो पढ़ लिया और भेद मिट गए, तो क्यों न मुझे पाने
की चाहत पाओ? ...